ऐ ज़िंदगी, तुझसे कुछ पलों की
मोहलत चाहता हूँ मैं |
भुला कर अपने सारे ग़म, कुछ लम्हे
चैन से जीना चाहता हूँ मैं |
इस बनावटी चहल-पहल को भूल,
माँ की गोद में सिर रख, फिर से
सपनों को बुनना चाहता हूँ मैं |
वो बचपन की निश्च्छल हँसी, जो
वक़्त के साथ कहीं गुम हो गई,
उस हँसी को फिर से
हँसना चाहता हूँ मैं |
कि अब कुछ पल अपनों के संग,
थोड़े सुकून से जीना चाहता हूँ मैं |
भुला कर अपने सारे ग़म, कुछ लम्हे
चैन से जीना चाहता हूँ मैं |
इस बनावटी चहल-पहल को भूल,
माँ की गोद में सिर रख, फिर से
सपनों को बुनना चाहता हूँ मैं |
वो बचपन की निश्च्छल हँसी, जो
वक़्त के साथ कहीं गुम हो गई,
उस हँसी को फिर से
हँसना चाहता हूँ मैं |
कि अब कुछ पल अपनों के संग,
थोड़े सुकून से जीना चाहता हूँ मैं |
ऐ ज़िंदगी, तुझसे कुछ पलों की
मोहलत चाहता हूँ मैं |
एक दफ़ा और, वही नादान, मासूम सा
बच्चा बन जाना चाहता हूँ मैं.....
मोहलत चाहता हूँ मैं |
एक दफ़ा और, वही नादान, मासूम सा
बच्चा बन जाना चाहता हूँ मैं.....
कि अब कुछ पल चैन से जीना चाहता हूँ मैं....