Sunday, November 27, 2011

ना तुम आये, ना मौत आई...

हुआ यूँ कि इक दौर चला तनहाइयों का,

पर मेरी तन्हाई को मिटने,
ना तुम आये, ना मौत आई...

बड़ी आरज़ू थी तुम्हें सीने से लगाने की,
पर मेरे कलेजे को ठण्ड पहुँचाने
ना तुम आये, ना मौत आई...

बड़ी बेतरतीबी से इंतेज़ार किया,
हौसला कई बार टूटा
पर हर बार,
फिर से ख़ुद को तैयार किया..
ख़ुद से जो थी जंग मेरी..
पर इस जंग को अंज़ाम दिलाने,
ना तुम आये, ना मौत आई...

रास्ता तो मेरे सफ़र का
बड़ा सुना पड़ गया है..
हलचल जो कभी मच भी जाती,
वो तो तूफानों की मेहेरबानी है..
क्यूँकि फिर से इस मुर्दा रेह्गुज़र को
त्योहारों सी रौनक दिलाने,
ना तुम आये, ना मौत आई...

तुम अगर कभी भूले से भी आते,
तो यक़ीनन मेरी उम्मीद की
गलियों में जलसा सा लग ही जाता.

या अगर कभी मौत ही आती,
तो इस आशिक़ की आवारगी का
तमाशा ही लग जाता.

जो भी होता,
तनहाइयाँ तो मिटती.
बेचैनी तो जाती.
पर ऐसा कुछ भी ना हुआ क्यूँकि,
मेरे ज़िन्दा जनाज़े को कन्धा देने
ना तुम आये, ना मौत आई...