Not everything in world reaches a perfect ending. I am leaving few of my thoughts incomplete as I find no reason for myself to bring them to an end.
"Completeness" gets its defination from what remains no more incomplete, as darkness is defined by the absence of light....
Let this time "emptiness" fill up your thoughts.
Hope you will like them......
"पागलपन छा जाए मुझ पर फिर से तेरा,
फिर से तू अपनी दिलकश हरक़त जो कर दे |
डूब जाऊं मैं तेरे हुस्न के दरिया में,
इस दीवाने की उल्फ़त में थोड़ी राहत तो कर दे |"
काश किसी दिन...
किसी दिन फिर से मैं तेरी जुल्फों को सहलाऊँ,
किसी दिन फिर से मैं तुम्हें "MAERI" सुनाऊँ |
चूम लूँ मैं तेरे होठों को इक दफा फिर से,
और फिर से तेरे आगोश में खो जाऊं किसी दिन,
काश किसी दिन....
किसी दिन फिर से समेट लूँ तुम्हें अपनी बाहों में,
किसी दिन फिर से भीग़ जाऊं तेरे हुस्न कि बारिश में |
देखूं तेरे साथ ढलता सूरज समंदर किनारे फिर से,
और फिर से तेरी पनाहों में सो जाऊं किसी दिन,
काश किसी दिन.....
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अब तुम ही बोलो...
मैं आज यूँ हूँ जैसे कोई
मोतियों का हार टूटा हो |
मुझे तो पिरोया था तुमने ही |
अब तुम ही बोलो,
तुम बिन ज़िंदगी ये मेरी,
कैसे कटेगी भला.....
दिल भी अब थकने लगा है मेरा,
साँसों ने भी मेरी
अब तो चलने से तौबा कर ली |
अब तुम ही बोलो,
तेरी खुश्बू बिन साँसें ये मेरी,
कैसे चलेंगी भला.....