लौट आओ...
लौट आओ...
हमारी दास्तान आज भी अधूरी है,
हमारी दास्तान को पूरा करने की ख़ातिर,
लौट आओ |
हमारे दरम्यान जाने कैसी ये दूरी है,
इस दूरी को मिटाने की खातिर,
लौट आओ |
ज़िंदगी के ये लंबे रास्ते
अब तन्हा कटते नहीं |
अपनों से जो बढ़ गए मेरे फ़ासले,
आख़िर क्यों सिमटते नहीं |
पड़ गया हूँ अकेला तेरे बिना,
अब और दर्द सहा नहीं जाता,
बड़ा मुश्किल हुआ जीना |
अब मेरी हिम्मत जवाब देने लगी है,
मुझे ढाँढस बाँधने की खातिर,
लौट आओ |
लौट आओ कि अब खुद से भी मेरा विश्वास उठने लगा है,
लौट आओ कि अब वक़्त के गुज़रने के साथ मेरा दायरा भी,
आहिस्ते-आहिस्ते सिमटने लगा है |
लौट आओ कि अब मेरे कदम डगमगाने लगे हैं,
लौट आओ की अब मेरे पैर लड़खड़ाने लगे हैं |
ज़िन्दगी की इस ढलती शब् में,
लौट आओ...
हमारी दास्तान आज भी अधूरी है,
हमारी दास्तान को पूरा करने की ख़ातिर,
लौट आओ |
हमारे दरम्यान जाने कैसी ये दूरी है,
इस दूरी को मिटाने की खातिर,
लौट आओ |
ज़िंदगी के ये लंबे रास्ते
अब तन्हा कटते नहीं |
अपनों से जो बढ़ गए मेरे फ़ासले,
आख़िर क्यों सिमटते नहीं |
पड़ गया हूँ अकेला तेरे बिना,
अब और दर्द सहा नहीं जाता,
बड़ा मुश्किल हुआ जीना |
अब मेरी हिम्मत जवाब देने लगी है,
मुझे ढाँढस बाँधने की खातिर,
लौट आओ |
लौट आओ कि अब खुद से भी मेरा विश्वास उठने लगा है,
लौट आओ कि अब वक़्त के गुज़रने के साथ मेरा दायरा भी,
आहिस्ते-आहिस्ते सिमटने लगा है |
लौट आओ कि अब मेरे कदम डगमगाने लगे हैं,
लौट आओ की अब मेरे पैर लड़खड़ाने लगे हैं |
ज़िन्दगी की इस ढलती शब् में,
शम्मा-ए-मोहोब्बत की लौ को,
आगे बढ़ाने की खातिर ,
लौट आओ |
तुमसे है ये गुज़ारिश मेरी कि,
एक आखिरी अलविदा करने कि खातिर,
लौट आओ...
लौट आओ...
लौट आओ...
लौट आओ...
लौट आओ...
लौट आओ...
No comments:
Post a Comment