Thursday, August 19, 2010

ख्वाहिश - ए - नादान

ज़िंदगी, तुझसे कुछ पलों की
मोहलत चाहता हूँ मैं |
भुला कर अपने सारे ग़म, कुछ लम्हे
चैन से जीना चाहता हूँ मैं |
इस बनावटी चहल-पहल को भूल,
माँ की गोद में सिर रख, फिर से
सपनों को बुनना चाहता हूँ मैं |
वो बचपन की निश्च्छल हँसी, जो
वक़्त के साथ कहीं गुम हो गई,
उस हँसी को फिर से
हँसना चाहता हूँ मैं |
कि अब कुछ पल अपनों के संग,
थोड़े सुकून से जीना चाहता हूँ मैं |
ऐ ज़िंदगी, तुझसे कुछ पलों की
मोहलत चाहता हूँ  मैं |
एक दफ़ा और, वही नादान, मासूम सा
बच्चा बन जाना चाहता हूँ मैं..... 
कि अब कुछ पल चैन से जीना चाहता हूँ मैं....

2 comments:

Spandan Mishra said...

the depth in the poem is wat actually made me realise that writing poems is something you are really serious about...and also something at which you can give others a run for their money....keep up the good work man....<3ing it

Anonymous said...

Simply. . . . (though what ur words delivered here are sometimes nt simple to express) AWESOME!!
Keep the pen rocking...